जिन्दगी के साज पर

ग़ज़ल जो छेड़ी है मैंने जिन्दगी के साज पर
कोई क्यूँ रूसवा हुआ है मेरी इक आवाज पर ।

उड़ चला नीले गगन में कल्पना के पंख धर
परिंदे को था भरोसा अपनी इस परव़ाज पर ।

खुलके मिलना और,बातें बनाना,जमाने की रीत है
कोई क्यूँ उँगली उठाये किसी भी रश्मों रिवाज पर ।

उनके आने से मेरे घर में खुश्बुएँ औ नूर है
आओ हम खुशियाँ मनायें इस नये आग़ाज पर ।

माँगता"स्वप्निल" दुआयें रब से अपने उम्र भर
कोई क्यूँ मजबूर हो जिन्दगी के साज पर   ।

शाम से गिरती रहीं फलक से ये बिजलियाँ
कोई जा मरहम लगा दे चाँद के इस दाग पर ।

बूढ़ी है,कमजोर है,पर सेंकती है रोटियाँ
एक लकड़ी जा सजा दे चूल्हे की इस आग पर ।

जा रहा परदेश वो अपने वतन को छोड़कर
ग़ज़ल लिखता जा रहा हूँ रात को भी जाग कर ।

  ©अनुरोध कुमार श्रीवास्तव

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1 Comments

Pinky singh

28-Jun-2021 10:14 PM

बहुत खुब

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